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Sunday, July 10, 2016

दिल

ज़रा दिल के दरवाजा को तुम  खोल के देखो
वहाँ हूँ की नहीं हूँ मैं थोडा नजर रखो ।
ये जमाना है मुश्किलों की कोई न रहा  है किस का
मैं कैसे समझू तुम्हारा हूँ अब नहीं हूँ था मैं जिस का
ओ मेरे प्यारे न्यारे  दिल को तुम  संभलके रखो ।।
 ज़रा दिल के दरवाजा को तुम खोल के देखो...........
दिल के ऊपर हाथ थमाकर ढूंडता हूँ कंहा तुम 
कभी कभी मेरे दिल के अन्दर हो ही जाती हो गुम  
वो मेरी प्यारी यारी अव तुम जिंदगी को जीना सीखो ।।
 ज़रा दिल के दरवाजा को तुम खोल के देखो...........

Friday, December 18, 2015

विकास की ओर -8

                    समय का मांग है विकास ,नारा भी है विकास ,और विकास की ओर हम सब तेजी से बढ़ रहे हैं । इस मार्ग मैं चलने वाले और दिशा निर्देश करनेवाले यदि पथभ्रष्ट नहीं होंगे तो अछे दिन ज्यादा दूर नहीं है।
                जीवन यात्रा शीर्षक पर हम लिखे हैं की हमारी गति एक रेखा पर नहीं एक वृत्त पर है ।

Friday, November 20, 2015

अब भी बाकि है -7

       मनुष्य किसी भी कार्य को करने से पहले श्रम ,समय और व्यय को विचार करता है I नए नए कौशल को अपनाता है I धीरे धीरे कार्य प्रणाली में परिवर्तन लाता है I कम समय ,कम श्रम और कम से कम व्यय  से अधिक उत्पादन होने को सम्यक कार्य और वैसे कार्य को संपादन करने वाले को हम  कार्य कुशली कहते हैं I समय था जब एक वस्त्र को निर्माण करने के लिए एक व्यक्ति को कई दिन लग जाता था I अब एक व्यक्ति एक दिन में हजारों वस्त्र निर्माण करने में समर्थ होता है I आज के युग में मनुष्य अपने श्रम ,समय और  व्यय को बचाने के लिए अनेक क्षेत्र में बहुमुखी कुशलता को प्रदर्शन करने में सक्षम हो चूका है I कंप्यूटर ,मोबाइल जैसे यंत्रों के प्रयोग से मनुष्य विकाश के चरम पर पहुँच गया जैसे लग रहा है I कभी  कभी मन में यह ख्याल आता है -अब जितना हो गया है , उसके बाद मनुष्य को भौतिक जगत में और क्या चाहिए ? सारी कामनाएं पूरी हो चुकी है I लेकिन आशाएं अनंत होते है I कभी समाप्त होने की नाम नहीं लेती I 

Saturday, November 7, 2015

ज्ञानगंगा -6

                     मनुष्य तो जिज्ञासु है I क्षुधा खाद्य से और प्यास पानी से शांत होते हैं I परन्तु जिज्ञासा ज्ञानपान करने से शांत न होकर बलवती होती है I यदि जिज्ञासा ज्ञान पान  करने से समाप्त हो जाती है ,तो ज्ञान का पथ रुद्ध हो जाता है I इसलिए ज्ञान रूप समुद्र से  सूक्ष्म बालूका कणों को संग्रह करते हुए यदि जीवन समाप्त हो जाए , तो उसे  सार्थक जीवन कहा जाता है I

Tuesday, November 3, 2015

दिव्यज्ञान -5

               एक दिव्यद्रष्टा अपने ज्ञानेन्द्रियों को एकाग्र करके दिव्यज्ञान को प्राप्त करता है .परन्तु एक वैज्ञानिक अपने ज्ञान को विज्ञानागार मैं वैज्ञानिक विश्लेषण के द्वारा ही प्राप्त करता है .एक को दिव्यज्ञान प्राप्त होता है दूसरे को विज्ञान प्राप्त होता है .एक पक्ष्य में प्राचीन प्रक्रिया अपर पक्ष्य में अर्वाचीन प्रक्रिया . चाहे कुछ भी हो उद्देश्य तो एक ही है .ज्ञान की प्राप्ति . जैसे पुरातन का उत्तराधिकारी नूतन है, वैसे प्राचीन का  उत्तराधिकारी अर्वाचीन है .इसलिए दिव्यज्ञान को विज्ञान से परखने का विचार अप्रासंगिक नहीं है .पर विज्ञान को कसौटी बनाकर दिव्यज्ञान को अप्रामाणिक करदेना मुर्खता नहीं है तो क्या है ? अर्थात् सजीव ज्ञानेन्द्रियों के उपलब्धियों को निर्जीव यंत्रों से ठुकरादेना असंगत ही है .

Thursday, October 29, 2015

Jivan yatra-4

 धरती पर यदि कोई व्यक्ति निरंतर आगे बढ़ते रहे  निश्चित है की वह अनंत की ओर नहीं बढ़ रहा है। जिस बिंदु से यात्रा  प्रारम्भ हुआ उसी बिंदु पर यात्रा समाप्त हो जाएगी इसमें कोई संदेह नहीं। इसका अर्थ  यह नहीं है की यात्रा न हो। लेकिन स्वीकारना होगा की हमारी  गति एक रेखा पर नहीं एक वृत पर  है।  जिसे क्षुद्र रूपसे शून्य कहते हैं , और बृहत् रूपसे पूर्ण कहते हैं। इस वृत को परिक्रमा करना ही संपूर्ण है l
                         आधुनिक मनुष्य जब विकाश के मार्ग पर चलना शुरु  किया,अनुसंधित्सु बनगया ,तव आवश्यकताओं को भरने के लिए क्षुधा पिपासा जैसी प्रवृतियों  के  साथ साथ जिज्ञासा भी मनुष्य का एक अंतर्निहित प्रवृति हो गया l  क्षुधा पिपासादी प्रवृतियों को शांत कर मनुष्य अन्य प्राणी जैसा सो नहीं गया l चिंतन किया ,कल्पना को वास्तव रूप मैं देखने की प्रयास किया ,चाहे वे सब कल्पनाओं को वास्तव रूप मैं  परिवर्तन करने के लिए मनुष्य के पास आज के जैसा बिज्ञानागार नहीं था l 
            मनुष्य अग्नि को पहचाना ,उसे प्रयोग करना सिखा ,जल मिट्टी आदि तत्वों को जाना ,कृषि करना ,एक स्थान पर रहना,भाव का आदान प्रदान करना सीखा, क्रमशः समृधि के पथ पर बढ़ने लगा जो यात्रा अवतक चल रहा है ,चलता भी रहेगा .निरंतर प्रयास के फल स्वरुप मनुष्य को ऐसी कुछ उपलब्धियां हासिल हुई जो मानव कल्याण के लिए अक्षय उर्जा को धारण किया .कुछ ऐसा भी मिला जो सर्वनाश का कारण भी वना .

Sunday, October 25, 2015

Parivartan-3

                                    आज के समय मनुष्य की आवश्यकता अनंत है। सारी  कामनाओं को पूरा करने के लिए मनुष्य क्या क्या नहीं किया ?क्या क्या नहीं कर रहा है ?अभी भी करने के लिए बहुत कुछ बाकी है। ऐसे अनंत जिज्ञासायें होंगे जो अवतक मानव मस्तिष्क मैं स्थानित नहीं हुआ होगा ,उन्हें भी करना पड़ेगा। 

Saturday, October 24, 2015

Chintan-2

          कोई भी   कार्य क्रियान्वित  होने से पहले वह  मस्तिस्क मैं सूक्ष्म रूप से स्वरुप को प्राप्त करता है। स्वाभाविक  क्रियाएँ  स्वतः हो   जाते हैं , परन्तु  मनुष्य अपने  सार्वभौमिक तथा   सामग्रीक  विकाश के    लिए जो कार्य करता है ,वे  सव अनेक चिंतन का मूर्त  रूप है।  प्राक  काल से मनुष्य अपने खाद्य, वस्त्र , निवसादि  मौलिक आवस्यकताओं की पूर्ति के  लिए  कितने  चिंतन नहीं किया होगा ?  कितने वार निष्फल हुआ होगा , अनेक  सफलताओं को प्राप्त किया होगा।  जिसका फल आज हम सव भोग कर रहे हैं, युगों तक भोग करते भी रहेंगे। --------- क्रमशः -------- 

Saturday, October 17, 2015

Shubharambh-1

या  देवी सर्व भूतेषु मातृ रुपेण  संस्थिता 
नमः तस्यै नमः तस्यै नमः तस्यै नमो नमः ll 
"मा- मातृभूमि ओर  मातृभाषा कि ममता जिसके हृदय पर जन्म नंही  हुआ, उसे यदि ज्ञानिओं  के बीच में गिना जाय तो अज्ञानिओं का   स्थान कहाँ  होगा ? "

आइए चलेंगे संस्कृत की ऑर ------------------------  
'उदेश्यम्  अनुदिश्य मंदोपि न प्रवर्तते' -इस कथनसे  यह प्रमाणित होता है की इस जगत मैं ऐसा  कोई कार्य  नहीं जिसके पिछे   कोई न कोई  उदेश्य न हो. यदिवा  स्पस्ट रूपसे प्रतीत नंही होता है  तो अप्रत्यक्ष्य रूपसे कार्य का कारण अवश्य छिपकर  रहता है। जब छोटे से छोटे प्राणिओं से लेकर  उद्भिदों के विकार   कार्यों में  उदेश्य अन्तर्निहित है तो  मनुष्य जैसे बुद्धितत्व समन्वित प्राणि  के  द्वारा   किया  गया कार्यों मैं कारणशून्यता  नंही  हो सकता है. क्रमशः।।।।।

Friday, October 16, 2015

Well Come

WELL COME TO THE NEW WORLD OF SANSKRIT