कोई भी कार्य क्रियान्वित होने से पहले वह मस्तिस्क मैं सूक्ष्म रूप से स्वरुप को प्राप्त करता है। स्वाभाविक क्रियाएँ स्वतः हो जाते हैं , परन्तु मनुष्य अपने सार्वभौमिक तथा सामग्रीक विकाश के लिए जो कार्य करता है ,वे सव अनेक चिंतन का मूर्त रूप है। प्राक काल से मनुष्य अपने खाद्य, वस्त्र , निवसादि मौलिक आवस्यकताओं की पूर्ति के लिए कितने चिंतन नहीं किया होगा ? कितने वार निष्फल हुआ होगा , अनेक सफलताओं को प्राप्त किया होगा। जिसका फल आज हम सव भोग कर रहे हैं, युगों तक भोग करते भी रहेंगे। --------- क्रमशः --------
No comments:
Post a Comment
PLS COMMENT HERE FOR MORE