Saturday, October 24, 2015

Chintan-2

          कोई भी   कार्य क्रियान्वित  होने से पहले वह  मस्तिस्क मैं सूक्ष्म रूप से स्वरुप को प्राप्त करता है। स्वाभाविक  क्रियाएँ  स्वतः हो   जाते हैं , परन्तु  मनुष्य अपने  सार्वभौमिक तथा   सामग्रीक  विकाश के    लिए जो कार्य करता है ,वे  सव अनेक चिंतन का मूर्त  रूप है।  प्राक  काल से मनुष्य अपने खाद्य, वस्त्र , निवसादि  मौलिक आवस्यकताओं की पूर्ति के  लिए  कितने  चिंतन नहीं किया होगा ?  कितने वार निष्फल हुआ होगा , अनेक  सफलताओं को प्राप्त किया होगा।  जिसका फल आज हम सव भोग कर रहे हैं, युगों तक भोग करते भी रहेंगे। --------- क्रमशः -------- 

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